गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की वर्तमान में प्रासंगिकता


"गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की प्रासंगिकता"
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1961 में बना गुटनिरपेक्षता आन्तदोलन आज अन्तर्राष्ट्रीय स्तर  पर संख्या बल की दृष्टि से शक्तिशाली संगठन है। वर्तमान में जबकि शीत युद्ध समाप्त हो चुका है, यू.एस.एस.आर का विघटन हो चुका है और विश्व  बहुध्रुवीय हो चुका है ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या गुटनिरपेक्षता आन्दोलन की आज के समय में सार्थकता है ?
इस आन्दोलन की शुरुआत -1961 में बेलग्रेड में हुई उस समय भारत के प्रधानमंत्री पं.जवाहर लाल नेहरु, मिस्त्र के राष्ट्रपति कर्नल नासिर एवं युगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटो इस आंदोलन के संस्थापक थे। बेलग्रेड सम्मेलन में 25 देशों ने भाग लिया। आज यह संख्या बल 120 तक पहुँच गई जो कि इस आंदोलन की शक्ति एवं लोकप्रियता के साथ ही इसकी सार्थकता को दर्शाता है।
गुटनिरपे राष्ट्र पंचशील के पांच सिद्धांतो में विश्वास रखतें हैं।- 
1.समानता एवं पारस्परिक लाभ का होना। 
2.एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना। 
3.एक दूसरे की संप्रभुता को बनाए रखना। 
4.प्रादेशिक एकता व अखंडता का आदर करना।
5.शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में विश्वास करना।
  ये सिद्धांत गुटनिरपेक्षता आन्दोलन के मुख्य आधार कहलातें हैं। गुटनिरपेक्षता की आलोचना भी की जाती है। इसको ‘किनारे पर बैठे रहना’ और ‘कायरता का रूप’ आदि कुछ देशों के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं। यधपि इसके सकारात्मक पक्षों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है।
              प्रासंगिकता के महत्वपूर्ण बिन्दु

गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने अपने 56 वर्षों से अधिक के कार्यकाल में अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं। इसकी महत्वपूर्ण उपलब्धि उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद की समाप्ति है, जिसके परिणामस्वरूप एशिया व अफ्रीका के तमाम देश स्वतंत्रता प्राप्त कर सके। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति की समाप्ति में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान है। इसके अतिरिक्त इसने नवोदित राष्ट्रों के मध्य एकता व सहयोग बढ़ाने, विश्व मंच पर उनके दृष्टिकोण को प्रस्तुत करने, गुटों से दूर रहकर संघर्ष के क्षेत्र को कम करने तथा विश्व शांति को प्रोत्साहित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है।1991 में सोवियत संघ के विघटन एवं शीत युद्ध की समाप्ति के उपरांत गुटनिरपेक्ष आंदोलन के औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लगने लगे। 
वस्तुतः वास्तविकता यह है कि गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का तात्पर्य विदेश नीति की स्वतंत्रता से है तथा इसका उद्देश्य संप्रभु राष्ट्रों की समानता व उनकी संप्रभुता व अखण्डता को सुरक्षित रखना है। इस संदर्भ में इसका औचित्य स्वयंसिद्ध हो जाता है। आज वैश्विक मंच पर विभिन्न अंतरराष्ट्रीय समस्याओं व चुनौतियों-मानवाधिकार, व्यापार वार्ताएँँ, जलवायु परिवर्तन वार्ताएँँ अथवा संयुक्त राष्ट्र संघ के सुधार-के संदर्भ में विकासशील देशों का दृष्टिकोण प्रस्तुत करने हेतु एक प्रभावी मंच की आवश्यकता है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन इसी मंच के रूप में कार्य करता है।
वस्तुतः गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की प्रासंगिकता को अग्रलिखित बिन्दुओं में देखा जा सकता है।
1. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन ने तीसरा विश्वयुद्ध होने से रोकने में मदद मिली।
2. एकध्रुवीय विश्व को बहुध्रुवीय विश्व में तबदील करने में मदद मिली।
3.आतंकवाद मुद्दे पर नकेल का काम किया और महाशक्तियाँ भी साथ नजर आने लगी।
4.पर्यावरण मुद्दे पर दुनिया भर में सकारात्मक संदेश देना।एव वैश्विक मंच को जागरूक करना।
5.अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की कामना में विश्वास बनाए रखना। एवं "सर्वे भवन्तु सुखिनः" की कामना करना।
6.अन्याय के खिलाफ माहोल बनाना।
7.भय और अविश्वास के विरुद खड़े रहना।
8.वसुद्धैव कुटुमकंब की धारणा बनाए रखना।
9.महाशक्तियों के साथ तालमेल बनाये रखना।
10. वैश्विक मंच पर अमीर- गरीब राष्ट्रों की खाई को पाटने में मदद करना।
आज भी भले ही गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को ज्यादा तवजो ना मिली, लेकिन सच्चाई यह है कि आज भी नाटो,अमरीका की दादागिरी या फिर वैश्विक संस्थाओं की मनमर्जी जारी है ऐसे में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष प्रयत्नों द्वारा वैश्विक मंच पर गुटनिरपेक्ष आन्दोलन सकारात्मक संदेश देने में अग्रणी हैं।


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